Lekhika Ranchi

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मुंशी प्रेमचंद ः सेवा सदन


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पंडित मदनसिंह की कई महीने तक यह दशा थी कि जो कोई उनके पास आता, उसी से सदन की बुराई करते-कपूत है, भ्रष्ट है, शोहदा है, लुच्चा है, एक कानी कौड़ी तो दूंगा नहीं, भीख मांगता फिरेगा, तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। पद्मसिंह को दानपत्र लिखाने के लिए कई बार लिखा। भामा कभी सदन की चर्चा करती, तो उससे बिगड़ जाते, घर से निकल जाने की धमकी देते, कहते– जोगी हो जाऊंगा, संन्यासी हो जाऊंगा, लेकिन उस छोकरे का मुंह न देखूंगा।

इसके पश्चात् उनकी मानसिक अवस्था में एक परिवर्तन हुआ। उन्होंने सदन की चर्चा ही करनी छोड़ दी। यदि कोई उसकी बुराई करता, तो कुछ अनमने-से हो जाते, कहते, भाई, अब क्यों उसे कोसते हो? जैसे उसने किया, वैसा आप भुगतेगा। अच्छा है या बुरा, मेरे पास से तो दूर है। अपने चार पैसे कमाता है, खाता है, पड़ा है, पड़ा रहने दो। लाला बैजनाथ उनके बहुत मुंह लगे थे। एक दिन वह खबर लाए कि उमानाथ ने सदन को कई हजार रुपए दिए हैं, अब नदी पार मकान बना रहा है, एक बागीचा लगवा रहा है। चूना पीसने की एक कल ली है, खूब रुपया कमाता है और उड़ाता है। मदनसिंह ने झुंझलाकर कहा– तो क्या चाहते हो कि वह भीख मांगे, दूसरों की रोटियां तोड़े? उमानाथ उसे रुपया क्या देंगे, अभी एक का चंदे से ब्याह किया है, आप टके-टके को मोहताज हो रहे हैं। सदन ने जो कुछ किया होगा, अपनी कमाई से किया होगा। वह लाख बुरा हो, निकम्मा नहीं है। अभी जवान है शौकीन है, अगर कमाता है और उड़ाता है, तो किसी को क्यों बुरा लगे? तुम्हारे इस गांव के कितने ही लौंड़े है, जो एक पैसा भी नहीं कमाते, लेकिन घर से रुपए चुराकर ले जाते हैं और चमारिनों का पेट भरते हैं। सदन उनसे कहीं अच्छा है। मुंशी बैजनाथ लज्जित हो गए।

कुछ काल उपरांत मदनसिंह की मनोवृत्ति पर प्रतिक्रिया का आधिपत्य हुआ। सदन की सूरत आंखों में फिरने लगी, उसकी बातें याद आया करती, कहते, देखो तो कैसा निर्दयी है, मुझसे रूठने चला है, मानों मैं यह जगह, जमीन, माल असबाब सब अपने माथे पर लादकर ले जाऊंगा। एक बार यहां आते नहीं बनता, पैरों में मेंहदी रचाए बैठा है! पापी कहीं का, मुझसे घमंड करता है, कुढ़-कुढ़कर मर जाऊंगा, तो बैठा मेरे नाम को रोएगा, तब भले वहां से दौड़ा आएगा, अभी नहीं आते बनता, अच्छा देखें, तुम कहां भागकर जाते हो, वहीं से चलकर तुम्हारी खबर लेता हूं।

भोजन करके जब विश्राम करते, तो भामा से सदन की बातें करने लगते– यह लौंडा लड़कपन में भी जिद्दी था। जिस वस्तु के लिए अड़ जाता था, उसे लेकर ही छोड़ता था। तुम्हें याद आता होगा, एक बार मेरी पूजा की झोली के बस्ते के वास्ते कितना महनामथ मचाया और उसे लेकर ही चुप हुआ। बड़ा हठी है, देखो तो उसकी कठोरता। एक पत्र भी नहीं भेजता। चुपचाप कान में तेल डाले बैठा है, मानों हमलोग मर गए हैं। भामा ये बातें सुनती और रोती। मदनसिंह के आत्माभिमान ने पुत्र-प्रेम के आगे सिर झुका दिया था।

इस प्रकार एक वर्ष के ऊपर हो गया। मदनसिंह बार-बार सदन के पास जाने का विचार करते, पर उस विचार को कार्य रूप में न ला सकते। एक बार असबाब बंधवा चुके थे, पर थोड़ी देर पीछे उसे खुलवा दिया। एक बार स्टेशन से लौट आए। उनका हृदय मोह और अभिमान का खिलौना बना हुआ था।

अब गृहस्थी के कामों में उनका जी न लगता। खेतों में समय पर पानी नहीं दिया गया और फसल खराब हो गई। असामियों से लगान नहीं वसूल किया गया। वह बेचारे रुपए लेकर आते, लेकिन मदनसिंह को रुपया लेकर रसीद देना भारी था। कहते, भाई, अभी जाओ, फिर आना। गुड़ घर में धरा-धरा पसीज गया, उसे बेचने का प्रबंध न किया। भामा कुछ कहती तो झुंझलाकर कहते, चूल्हे में जाए घर और द्वार, जिसके लिए सब कुछ करता था, जब वही नहीं है तो यह गृहस्थी मेरे किस काम की है? अब उन्हें ज्ञात हुआ कि मेरा सारा जीवन, सारी धर्मनिष्ठा, सारी कर्मशीलता, सारा आनंद केवल एक आधार पर अवलंबित था और वह आधार सदन का था।

इधर कई दिनों से पद्मसिंह भी नहीं आए थे। एक बड़ा कार्य संपादन करने के उपरांत चित्त पर जो शिथिलता छा जाती है, वही अवस्था उनकी हो रही थी। मदनसिंह उनके पास भी पत्र न भेजते थे। हां, उनके पत्र आते तो बड़े शौक से पढ़ते, लेकिन सदन का कुछ समाचार न पाकर उदास हो जाते।

एक दिन मदनसिंह दरवाजे पर बैठे हुए प्रेमसागर पढ़ रहे थे। कृष्ण की बाल-लीला में उन्हें बच्चों का-सा आनंद आ रहा था। संध्या हो गई थी। सूझ न पड़ते थे, पर उनका मन ऐसा लगा हुआ था कि उठने की इच्छा न होती थी। अकस्मात् कुत्तों के भूंकने ने किसी नए आदमी के गांव में आने की सूचना दी। मदनसिंह की छाती धड़कने लगी। कहीं सदन तो नहीं आ रहा है। किताब बंद करके उठे, तो पद्मसिंह को आते देखा। पद्मसिंह ने उनके चरण छुए, फिर दोनों भाइयों में बातचीत होने लगी।

मदनसिंह– सब कुशल है?

पद्मसिंह– जी हां, ईश्वर की दया है।

मदनसिंह– भला, उस बेईमान की भी कुछ खोज-खबर मिली है?

पद्मसिंह– जी हां, अच्छी तरह है। दसवें-पांचवें दिन मेरे यहां आया करता है। मैं कभी-कभी हाल-चाल पुछवा लेता हूं। कोई चिंता की बात नहीं है।

मदनसिंह– भला, वह पापी कभी हमलोगों की भी चर्चा करता है या बिल्कुल मरा समझ लिया? क्या यहां न आने की कसम खा ली है? क्या यहां हमलोग मर जाएंगे, तभी आएगा? अगर उसकी यही इच्छा है, तो हमलोग कहीं चले जाएं। अपना घर संभाले। सुनता हूं, वहां मकान बनवा रहा है। वह तो वहां रहेगा? और यहां कौन रहेगा? वह मकान किसके लिए छोड़े देता है?

पद्मसिंह– जी नहीं, मकान-वकान कहीं नहीं बनवाता, यह आपसे किसी ने झूठ कह दिया। हां, चूने की कल खड़ी कर ली है और यह भी मालूम हुआ है कि नदी पार थोड़ी-सी जमीन भी लेना चाहता है।

मदनसिंह– तो उससे कह देना, पहले आकर इस घर में आग लगा जाए, तब वहां जगह-जमीन ले।

पद्मसिंह– यह आप क्या कहते हैं, वह केवल आपलोगों की अप्रसन्नता के भय से नहीं आता। आज उसे मालूम हो जाए कि आपने उसे क्षमा कर दिया, तो सिर के बल दौड़ा आए। मेरे पास आता है, तो घंटों आप ही की बातें करता रहता है। आपकी इच्छा हो, तो कल ही चला आए।

मदनसिंह– नहीं, मैं उसे बुलाता नहीं। हम उसके कौन होते है, जो यहां आएगा? लेकिन यहां आए तो कह देना, जरा पीठ मजबूत कर रखे। उसे देखते ही मेरे सिर पर शैतान सवार हो जाएगा और मैं डंडा लेकर पिल पड़ूंगा। मूर्ख मुझसे रूठने चला है। तब नहीं रूठा था, जब पूजा के समय पोथी पर लार टपकाता था, खाने की थाली के पास पेशाब करता था। उसके मारे कपड़े साफ न रहने पाते थे, उजले कपड़ों को तरस के रह जाता था। मुझे साफ कपड़े पहने देखना था, तो बदन से धूल-मिट्टी लपेटे आकर सिर पर सवार हो जाता। तब क्यों नहीं रूठा था? आज रूठने चला है। अब की पाऊं तो ऐसी कनेठी दूं कि छठी का दूध याद आ जाएगा।

दोनों भाई घर गए। भामा बैठी गाय को भूसा खिला रही थी और सदन की दोनों बहनें खाना पकाती थीं। भामा देवर को देखते ही खड़ी हो गई और बोली– भला, तुम्हारे दर्शन तो हुए। चार पग पर रहते हो और इतना भी नहीं होता कि महीने में एक बार तो जाकर देख आए– घर वाले मरे कि जीते हैं। कहो, कुशल से तो रहे?

पद्मसिंह– हां, सब तुम्हारा आशीर्वाद है। कहो, खाना क्या बन रहा है? मुझे इस वक्त खीर, हलुवा और मलाई खिलाओ, तो वह सुख-संवाद सुनाऊं कि फड़क जाओ। पोता मुबारक हो।

भामा के मलिन मुख पर आनंद की लालिमा छा गई और आंखों में पुतलियां पुष्प के समान खिल उठीं। बोली– चलो, घी-शक्कर के मटके में डूबा दूं, जितना खाते बने, खाओ।

मदनसिंह ने मुंह बनाकर कहा– यह तुमने बुरी खबर सुनाई। क्या ईश्वर के दरबार में उल्टा न्याय होता है? मेरा बेटा छिन जाए और उसे बेटा मिल जाए। अब वह एक से दो हो गया, मैं उससे कैसे जीत सकूंगा? हारना पड़ा। यह मुझे अवश्य खींच ले जाएगा। मेरे तो कदम अभी से उखड़ गए। सचमुच ईश्वर के यहां बुराई करने पर भलाई होती है। उल्टी बात है कि नहीं? लेकिन अब मुझे चिंता नहीं है। सदन जहां चाहे जाए, ईश्वर ने हमारी सुन ली। कै दिन का हुआ है?

पद्मसिंह– आज चौथा दिन है, मुझे छुट्टी नहीं मिली, नहीं तो पहले ही दिन आता।

मदनसिंह– क्या हुआ, छठी तक पहुंच जाएंगे, धूमधाम से छठी मनाएंगे। बस, कल चलो।

भामा फूली न समाती थी। हृदय पुलकित हो उठा था। जी चाहता था कि किसे क्या दे दूं, क्या लुटा दूं? जी चाहता था, घर में सोहर उठे, दरवाजे पर शहनाई बजे, पड़ोसिनें बुलाई जाएं। गाने-बजाने की मंगल ध्वनि से गांव गूंज उठे। उसे ऐसा ज्ञात हो रहा था, मानो आज संसार में कोई असाधारण बात हो गई है, मानो सारा संसार संतानहीन है और एक मैं ही पुत्र-पौत्रवती हूं।

एक मजदूर ने आकर कहा– भौजी, एक साधु द्वार पर आए हैं। भामा ने तुरंत इतनी जिन्स भेज दी, जो चार साधुओं के खाने से भी न चुकती।

ज्योंही लोग भोजन कर चुके, भामा अपनी दोनों लड़कियों के साथ ढोल लेकर बैठ गई और आधी रात गाती रही।

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